चुनाव परिणाम के लिए चरम पर पहुंची लोगों की अधीरता- राजनीतिक भी सांस रोककर कर परिणाम की प्रतीक्षा

205
views

एम हसीन / परम नागरिक 

 

लोकसभा चुनाव के परिणाम को लेकर लोगों की अधीरता बढ़ती जा रही है। दूसरी ओर राजनीतिक लोग भी सांस रोके परिणाम की प्रतीक्षा कर रहे हैं। हालांकि किसी भी दल की हवा न होने के कारण कोई भी दल या प्रत्याशी अपनी जीत का दावा करने की स्थिति में नहीं है लेकिन यह भी हकीकत है कि अगर परिणाम बदलता है और कांग्रेस जीतती है तो ज़िले का राजनीतिक समीकरण भी बदलना लाज़मी होगा। वैसे तो अगर भाजपा जीतती है तो सभी दलों के भीतरी समीकरण प्रभावित होना लाज़मी होंगे।

11 अप्रैल को संपन्न हुए मतदान का परिणाम 23 मई को आना है। चुनाव के समय ही यह स्थापित हो गया था कि स्थानीय सांसद व भाजपा प्रत्याशी डा. रमेश पोखरियाल निशंक का क्षेत्र में ज़बरदस्त विरोध था। बहुसंख्यक मतदाताओं के एक वर्ग के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का समर्थन बरक़रार था लेकिन बहुसंख्यकों के ही दूसरे वर्ग में उनका ज़बरदस्त विरोध भी था। साथ ही यह भी स्थापित है कि कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में हरीश रावत की बजाय अम्बरीष कुमार मैदान में थे जिन्हें हरीश रावत और निशंक के मुकाबले कमज़ोर माना गया था। दलित वर्ग का बसपा प्रत्याशी डा. अंतरिक्ष सैनी को और मुस्लिम वर्ग का कांग्रेस को एकतरफ़ा सा समर्थन दिखा था। खास तौर पर दलितों की बसपा की ओर वापसी से भाजपा का समर्थन घटना लाज़मी है लेकिन इससे कांग्रेस को कितना लाभ होगा यह देखने वाली बात होगी। मौजूदा स्टेज पर यह दावा करने की स्थिति में कोई दल नहीं है कि वह निश्चित जीत की स्थिति में है।

यही कारण है कि परिणाम से ऐन पहले ज़िले की राजनीति ठहर गई है। लेकिन परिणाम के बाद काफी हिलडुल होना निश्चित है। मसलन, इस चुनाव में कांग्रेस का समर्थन करने वाले पूर्व विधायक मु. शहज़ाद अपना अगला क़दम निर्धारित करेंगे। इसी प्रकार रुड़की में मेयर चुनाव की राजनीति शुरू होगी। अगर बसपा का प्रदर्शन अच्छा रहता है तो कुछ टिकट के दावेदार बसपा की ओर लाज़िमन उन्मुख होंगे। भाजपा के कुछ विधायकों के विषय में यह स्पष्ट हो चुका है कि उन्होंने पार्टी प्रत्याशी का समर्थन नहीं किया। उनका अगला क़दम भी परिणाम के बाद तय होगा कि वे भाजपा में रहने को तरजीह देंगे या बसपा की ओर उन्मुख होंगे। अगर कांग्रेस जीतकर आती है तो पार्टी 2022 के विधानसभा चुनाव की ओर बढ़ेगी। वे चेहरे राजनीति की पहली पांत में शामिल होंगे जो पार्टी टिकट के दावेदार होंगे। साथ ही पिछली बार चुनाव लड़े कई चेहरे अपने लिये नये ठिकाने तलाशने पर मजबूर होंगे।

देहात की राजनीति पर नज़र रखने वाला एक वर्ग 2020-21 के पंचायत चुनाव के हिसाब से भी अपना अगला क़दम निर्धारित करेगा। यह एक हकीकत है कि लोकसभा चुनाव में भले ही हरिद्वार सीट पर बसपा को अभी पहली जीत का इंतज़ार हो, विधानसभा चुनाव के लिहाज से भले ही वह काफी कमजोर हो गई हो लेकिन ज़िला पंचायत की राजनीति में आज भी उसका दबदबा है। यही कारण है कि तीन बार बसपा से निष्कासित होने के बावजूद पूर्व विधायक मु. शहज़ाद ने अभी तक भी किसी अन्य दल का दामन नहीं पकड़ा है। ज़िला पंचायत की राजनीति का ही असर है कि इस बार मु. शहज़ाद का निष्कासन होते ही चौ. राजेंद्र सिंह ने तत्काल किसान आयोग अध्यक्ष पद और कांग्रेस छोड़कर बसपा का दामन थाम लिया था। ये दोनों ही नेता ज़िले की राजनीति में ज़िला पंचायत के कारण ही ज़िंदा हैं। कहने का मतलब यह है कि चुनाव परिणाम के बाद राजनीति की मौजूदा शांति भंग होगी।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here