अभिभावकों के लिए तो बेहतर होगा यह क़दम – मगर फी एक्ट पर मनचाही कर पाएंगे शिक्षा मंत्री?

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एम हसीन / परम नागरिक 

 

शिक्षा मंत्री अरविन्द पांडे बोल्ड मंत्री हैं, संघ की पृष्ठभूमि से हैं और काफी हद तक चीज़ों के जानकार भी हैं। उनका यह कहना खासा गौरतलब है कि लोकसभा चुनाव की आचार संहिता संपन्न होते ही राज्य सरकार सूबे में फीस एक्ट लागू करेगी। लेकिन सवाल यह है कि क्या वे इस मामले में मनचाही कर पाएंगे? इस बात को एन सी इ आर टी की पुस्तकों को लागू करने के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। पांडे ने खम ठोककर यह आदेश जारी किया था कि अब स्कूलों में निजी प्रकाशकों की पुस्तकें नहीं लगाई जा सकेंगी। इसे लेकर पिछले साल हाई कोर्ट का आदेश भी आया था। लेकिन क्या पांडे की चल सकी? नहीं चल सकी। जिन स्कूलों ने चाहा है, उन्होंने निजी प्रकाशकों की पुस्तकों को लागू किया है।

दरअसल, वास्तविकताओं का अहसास खुद पांडे को होना चाहिये क्योंकि वे न केवल सियासतदां हैं बल्कि संघ की पृष्ठभूमि से भी आते हैं। उन्हें पता होना चाहिए कि माध्यमिक स्तर की 10 प्रतिशत शिक्षा संस्थाएं सीधे संघ द्वारा संचालित की जा रही हैं। विद्या भारती के तहत इन संस्थाओं का संचालन ऐन उसी पैटर्न पर हो रहा है जिस पैटर्न पर निजी शिक्षण संस्थाएं चल रही हैं। वही पाठ्यक्रम है, वही फ़ी स्ट्रक्चर और वही तौर-तरीके। यह पहला मसला है। दूसरा मसला भी खासा दिलचस्प है। मैं रुड़की की मिसाल देता हूँ। 2017 कि विधानसभा चुनाव में जो प्रदीप बत्रा भाजपा के प्रत्याशी और तत्कालीन कांग्रेस विधायक थे-अब वे भाजपा विधायक हैं-वे रुड़की में दिल्ली पब्लिक स्कूल के निदेशक हैं। उनके तब के मुख्य चुनाव संयोजक डा. अनिल शर्मा खांटी संघी और आनंद स्वरुप आर्य सरस्वती विद्या मंदिर के प्रबंधक हैं। वे चुनाव के समय भी इस पद पर थे। वे अब शायद माध्यमिक शिक्षक संघ के प्रदेश अध्यक्ष भी हैं। पदाधिकारी तो पक्का हैं। दिल्ली पब्लिक स्कूल के दूसरे निदेशक राम अग्रवाल कांग्रेस के टिकट पर पिछ्ला मेयर चुनाव लड़ चुके हैं और इस बार भाजपा टिकट के दावेदार बताये जा रहे हैं। डा. अनिल शर्मा पिछ्ला मेयर चुनाव बतौर निर्दलीय लड़ चुके हैं और इस बार भाजपा से दावेदार हैं।

इस क्रम में यह जान लेना भी जरूरी है कि 2017 में कांग्रेस के टिकट पर रुड़की में चुनाव लड़े पूर्व भाजपा विधायक और वर्तमान भाजपा नेता सुरेश जैन रुड़की में शिक्षा व्यवसाय के भीष्म पितामह माने जाते हैं, हालाँकि वे खुद तकनीकी शिक्षा के क्षेत्र में रहे हैं। लेकिन उनके 2017 के चुनाव में संयोजक रहे अशोक चौहान ग्रीनवे सीनियर सेकंडरी स्कूल के निदेशक थे और हैं। वे कांग्रेस के मेयर टिकट के दावेदार हैं। उनकी पत्नी हरीश रावत सरकार में ओहदेदार रह चुकी हैं। इसी प्रकार तब सुरेश जैन के कांग्रेस में आगमन पर उनका सबसे पहला स्वागत समारोह आयोजित करने वाले जावेद इक़बाल सैंट मार्क्स अकादमी सीनियर सेकंडरी स्कूल के निदेशक हैं। उनकी पत्नी भी कांग्रेस सरकार में ओहदेदार रह चुकी हैं जबकि वे खुद मंगलौर नगर पालिका अध्यक्ष पद के कांग्रेस टिकट के दावेदार रह चुके हैं। उनके पिता हमीद सर्राफ इस नगर पालिका के अध्यक्ष रह चुके हैं।

हक़ीक़त है कि रुड़की निजी शिक्षा का हब है। यहाँ सैकड़ों स्कूल संचालक हैं जिनमें कई दर्जन सीनियर सेकेंडरी स्कूल चलाते हैं। इनमें कुछ विधानसभा टिकट के दावेदार हैं और कुछ मेयर या नगर पालिका अध्यक्ष पद के। यहाँ कई बड़े अधिकारियों की राजनेता पत्नियां भी स्कूल चला रही हैं। ज़ाहिर है कि ऐसी ही हकीकत पूरे प्रदेश की होगी। क्योंकि रुड़की तो एक विधानसभा सीट और एक ही मेयर पद है। उत्तराखंड में तो 70 विधानसभा सीट, दर्जनभर मेयर सीट, सैकड़ों नगर पालिका या नगर पंचायत अध्यक्ष पद, दर्जनों ब्लॉक प्रमुख पद, दर्जन से ज़्यादा ज़िला पंचायत अध्यक्ष पद हैं। जब रुड़की में शिक्षा व्यवसायियों का राजनीति में इतना दखल है तो कोई बड़ी बात नहीं कि पूरे प्रदेश की हकीकत भी वैसी ही हो जैसी रुड़की की है। फिर, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ तो सर्वत्र व्याप्त है ही और अब तो ईसाई मिशनरियां भी इसी राह पर काम कर रही हैं।

ऐसे में यह सवाल बेहद अहम है कि राजनीति और व्यवस्था पर इतना गहरा प्रभाव रखने वाली बेहद शक्तिशाली निजी स्कूल संचालकों की लॉबी से क्या अकेले अरविन्द पांडे लड़ सकते हैं? अनुभव बताता है कि नहीं लड़ सकते। ऐसे में, मेरी राय में उनकी ताज़ा घोषणा से किसी को कोई उम्मीद नहीं पालनी चाहिए। खुद पांडे को भी यह बात समझनी चाहिए कि अगर सरकार की प्राथमिकता शुल्क अधिनियम लागू करने की होती तो शिक्षा का व्यवसायीकरण होता ही क्यों? आखिर आज के अधिकांश स्कूल संचालक सरकार नियंत्रित स्कूलों में ही तो पढ़े होंगे। तब क्या शिक्षा व्यवसाय थी?

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