पानी को लेकर हाहाकार मचा है प्रदीप बत्रा के शहर में महत्वकांक्षी पेयजल परियोजना के उलटे नतीजे आ रहे सामने

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एम हसीन

व्यवस्था की अपनी एक सोच है। इस सोच में जो चीज़ें अनिवार्य रूप से शामिल हैं उनमें एक यह भी है कि काम हो नहीं बल्कि केवल होता हुआ दिखाई दे। अगर काम हो गया तो सबकुछ गड़बड़ हो जायेगी। लोग फिर कुछ और सोचने लग जाएंगे, कुछ और मांगने लग जाएंगे, जिसमें समानता का अधिकार सबसे पहले होगा। विधायक प्रदीप बत्रा के रुड़की नगर की हालत भी इसका अपवाद नहीं है। ऐसे में कोई बड़ी बात नहीं कि पिछले ही साल बेहद ‘महत्वकांक्षी पेयजल परियोजना’ पूरी होने के बावजूद नगर के कई हिस्सों में पानी को लेकर हाहाकार है। लोगों की समस्याएं कई हैं लेकिन सबके लिए जवाबदेह जल-संस्थान ही है। यह अलग बात है कि जल-संस्थान की भी समस्या है। बेशक जल-संस्थान की समस्या का तोड़ उस राज्य सरकार के पास है जो विधायकों की उँगलियों पर नाचती है। यानि, अगर नगर में पेयजल समस्या है तो उसकी अंतिम ज़िम्मेदारी विधायक की ही है और रुड़की के विधायक हैं प्रदीप बत्रा।

मौजूदा गर्मी के सीजन में आज लगातार दूसरे दिन पानी को लेकर लोगों के प्रदर्शन की खबर आई। कल सोत मोहल्ले में प्रदर्शन हुआ था और आज भारत नगर और उससे जुड़ी कॉलोनियों के लोगों ने यही काम किया। सूबे में भाजपा की सरकार है और नगर विधायक प्रदीप बत्रा भी भाजपा से ही आते हैं, जबकि पेयजल की मुख्य समस्या झेल रही आबादियों में कांग्रेस समर्थक लोग रहते हैं। लेकिन ऐसा मुकम्मल तौर पर नहीं है। यहाँ बत्रा का बड़ा समर्थक वर्ग मौजूद है। दूसरी बात, 2017 में कांग्रेस टिकट पर चुनाव हार सुरेश जैन भी भाजपा की ही राजनीति कर रहे हैं। ऐसे में बत्रा, जैन या सरकार समस्या से पल्ला झाड़ पाने की स्थिति में नहीं हैं।

बहरहाल, सोत मोहल्ले के लोगों की शिकायत केवल पानी की किल्लत की ही नहीं है। शिकायत प्रदूषित पेयजल आपूर्ति की भी है। यानि, देर रात-बिरात जब पानी आता है तो उसमें गंदगी मिली होती है जो कि सीवर लाइन से आती है। इसके विपरीत भारत नगर आदि के लोगों का कहना यह है कि यहाँ जलापूर्ति ही नहीं। बात कुछ भी हो, समस्या के लिए ज़िम्मेदार तो जल-संस्थान ही है।

संस्थान के एक अधिकारी ने इस बाबत पूछे जाने पर बताया कि समस्या बिजली की कमी और कम वोल्टेज के कारण आ रही है।यह सच है कि बिजली लाइनों पर काम जारी होने के कारण इन दिनों बिजली ठप्प रहती है। यह भी ठीक है कि जब बिजली आये तब भी वोल्टेज कम होते हैं। दोनों चीज़ों का नतीजा यह है कि जल-संस्थान की मशीनें नहीं चल पाती और वह आवश्यक मात्रा में जल का भण्डारण नहीं कर पाता।
इस बीच चूँकि लोग टुल्लू पम्प चलाये रखते हैं तो इससे पानी तो नहीं आता लेकिन प्रेशर ऐसी जगहों से गन्दा पानी खींच लेता है जहाँ लाइन में लीकेज हो।

विभाग की मानें तो उसे अपने हर ट्यूब वेल पर जनरेटर की ज़रूरत है ताकि वह आवश्यकता के अनुसार जल-उत्पादन कर सके। अब सवाल यह है कि जल-संस्थान की इस समस्या, खसतौर पर लो-वोल्टेज का, हल कौन निकाले? ज़ाहिर है कि राज्य सरकार ही ऐसा कर सकती है और राज्य सरकार का धयान इस और दिलाने की ज़िम्मेदारी विधायक की है। ज़ाहिर है कि विधायक अगर सरकार से जनहित के काम कराएंगे तो अपने व्यक्तिगत या अपने खास लोगों के, मित्रों के काम वे नहीं करा पाएंगे।

वैसे पेयजल संकट की बाबत सब जानते हैं कि यह तेज़ गर्मी में ही पैदा होता है। अप्रैल के बाद और जून में बारिशें शुरू होने तक ही बिजली की समस्या होती है और इसी अवधि में पानी की ज़रूरत बढ़ती है। इन दो-ढाई महीनों में इन दोनों समस्याओं को लेकर जल-संस्थान और विद्युत विभाग के अधिकारी, सरकार व विधायक सब कानों में तेल डाल कर बैठ जाते हैं। उनकी सोच यह है कि ‘कुछ दिन लोग शिकायत करेंगे, चिल्लायेंगे, धरना-प्रदर्शन करेंगे और फिर थक कर बैठ जाएंगे। जब बरसात ही जायेगी तो बात खुद-बखुद ख़त्म हो जायेगी।’ वैसे अहम यह है कि पानी को लेकर रामनगर के दोनों पूर्व पार्षद भी पिछले सप्ताह धरने पर बैठे थे। रामनगर प्रदीप बत्रा के सजातीय पंजाबियों की कॉलोनी है और बत्रा का गढ़ भी। यहाँ के लोग जागरूक भी हैं। इसलिये हो सकता है कि जो बात सोत-भारत नगर में ख़त्म हो जाए वो रामनगर में ख़त्म न हो। कल हम चर्चा करेंगे महत्वकांक्षी पेयजल परियोजना पर।

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