डा. निशंक के लिए आसान नहीं हालात – इस बार न थाली में रखा मिला टिकट न थाली में रखी मिलेगी सीट

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    एम हसीन / परम नागरिक 
    पूर्व मुख्यमंत्री व सांसद डा. रमेश पोखरियाल निशंक ने भाजपा में अच्छे-बुरे सभी प्रकार के दिन देखे हैं। उन्हें वह दिन भी याद होगा जब उत्तर प्रदेश में रहते वे कैबिनेट का हिस्सा बने थे और वह दिन भी जब क्षमताएं होने के बावजूद उत्तराखण्ड का मुख्यमंत्री बनने में उन्हें 9 साल लग गए थे। वह दिन भी जब उन्हें मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा था और वह दिन भी जब खुद भाजपा नेतृत्व ने ही उन्हें सरकार बनाने के प्रयासों के प्रति हतोत्साहित किया था। इसी प्रकार उन्हें वह दिन भी याद होगा जब हरिद्वार संसदीय सीट पर लोकसभा टिकट उन्हें थाली में सजाकर दिया गया था और वह दिन भी जब संसदीय सदस्यता उन्हें थाली में सजी हुई मिली थी।
    उन्हें पिछला एक सप्ताह भी याद होगा जब सिटिंग एम पी होने के बावजूद उन्हें टिकट हासिल करने के लिए पूरा पसीना बहाना पड़ा। ऐसे ही अगले 20 दिन भी उन्हें नहीं भूलेंगे। क्योंकि जैसे इस बार उन्हें टिकट के लिये पसीना बहाना पड़ा है वैसे ही चुनाव जीतने के लिये भी पसीना बहाना पड़ेगा। इस हकीकत को वे अपने दिमाग में रखकर काम करेंगे तो शायद अनुकूल नतीजा हासिल करने में कामयाब रहें।
    चुनाव में डा. निशंक अपने व्यक्तित्व और क्रिया-कलाप के अलावा नेतृत्व के नाम और काम के अलावा पार्टी विधायकों के नाम व काम तथा कार्यकर्ताओं के साथ मैदान में उतरेंगे। प्रचार के लिये उनके पास ज़्यादा समय नहीं है क्योंकि 22 को वे नामांकन करेंगे और 11 को मतदान हो जाएगा। यानि सबकुछ 19 दिन में होना है। यानि अपनी बात मतदाता तक पहुँचाने के लिये मीडिया पर उनकी निर्भरता बहुत अधिक रहेगी। यह उनकी एक समस्या है।
    दरअसल, बतौर सांसद अपने संसदीय क्षेत्र में डा. निशक का सारा विकास, सारी सक्रियता पिछली फरवरी के बाद ही दिखाई दी है। इससे पूर्व वे पिछले विधानसभा चुनाव से पहले सक्रिय हुए थे। तब उन्हें इस बात की खासी उम्मीद थी कि शायद चुनाव बाद पार्टी नेतृत्व उन्हें सूबे की कमान सौंपी दे। इसी के मद्दे-नज़र तब उन्होंने अपनी सांसद निधि से कुछ कामों का लोकार्पण या शिलान्यास किया था। केंद्रीय योजना के तहत कुछ स्थानों पर गैस सिलेंडरों का वितरण भी किया था। तब तक ज़िले के लिये कोई विकास योजना उन्होंने केंद्र से अपने प्रस्ताव पर स्वीकार नहीं कराई थी। चुनाव के बाद जब उनकी दाल सूबे में नहीं गली थी तो वे फिर अंतर्धान हो गए थे। सच बात तो यह है कि पिछले फरवरी से पहले वे खुद ही संसदीय चुनाव को लेकर निराश से थे। यही कारण है कि उन्होंने क्षेत्र अपने प्रतिनिधियों के हवाले किया हुआ था। वही जो करना था स्याह-सफ़ेद कर रहे थे। यूँ उनके और जनता के ही नहीं उनके और मीडिया के बीच भी दुरी बनी थी। इस दुरी का ही एक परिणाम स्थानीय प्रत्याशी की मुहिम के रूप में सामने आया था। यह चीज़ बहुत नीचे तक घर कर चुकी है। भले ही निशंक के प्रतिनिधि उन्हें जो चाहे बता रहे हों लेकिन हकीकत यह है कि उन्हें इसकी गंभीरता का अहसास नहीं है। फिर विधायकों की अपनी निराशा और अपनी छवि है। यही स्थिति कार्यकर्ताओं की है। ऐसे में निशंक कैसे हालात का सामना करेंगे यह देखने वाली बात होगी। बहरहाल, मुद्दे और भी हैं जिनपर आगे चर्चा होती रहेगी।

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