क्यों नहीं रानी देवयानी? क्यों नहीं वैजयंती माला? क्यों नहीं नरेंद्र सिंह? क्या किसी अतिरिक्त योग्यता पर मिलता है लोकसभा का टिकट?

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एम हसीन / परम नागरिक 

 

किसी राजनीतिक दल का टिकट क्या किसी खास डिग्री, डिप्लोमा, कोर्स या एंट्रेंस के आधार पर मिलता है? क्या किसी खास मुहूर्त में, खास परिवार में, खास धर्म में, खास जाति में, खास वर्ग में जन्म लेने, किसी खास गुरु से शिक्षा-दीक्षा हासिल करने से टिकट मिलता है? यदि ऐसा कुछ नहीं है तो फिर रानी देवयानी को ही भाजपा का टिकट दिए जाने में दिक़्क़त क्या है? आखिर टिकट की अधिकतम अहर्ताएं तो रानी देवयानी रखती ही हैं। मान लो उनकी राजसी ससुराल का राजनीति में कोई महत्व नहीं, चलो यह भी मान लो कि चौथी बार विधानसभा जीते प्रणव सिंह चैंपियन की पत्नी होना भी उनकी अपनी, व्यक्तिगत राजनीतिक, योग्यता नहीं है। लेकिन वे भारतीय तो हैं। भाजपा की राजनीति में फिट हो सकने लायक हिन्दू चेहरा तो हैं। पिछड़ों को सम्मान देने वाली नरेंद्र मोदी की भाजपा की सोच के अनुरूप पिछड़ा वर्ग से तो हैं। महिला को सम्मान देने का दम भरने वाले समाज में महिला तो हैं। शिक्षा को स्वीकारने वाले कुलीम जगत में उच्च शिक्षा प्राप्त तो हैं। सदस्यता प्रदान किये जाने के बाद भाजपा में तो हैं और तीन बार की निर्वाचित ज़िला पंचायत सदस्य यानि जन-प्रतिनिधि तो हैं।

कतिपय लोगों को लगेगा कि मैं खास देवयानी का टिकट मांग रहा हूँ। स्पष्ट कर दूँ कि मैं नहीं बल्कि खुद रानी देवयानी टिकट मांग रही हैं और हाँ बेशक मैं उनका समर्थन कर रहा हूँ। यदि वे अपने लिए टिकट न मांगती तो उनके लिए मेरे मांगने से क्या होता? मैं केवल इतना कहना चाहता हूँ कि आज के दौर में जिस प्रकार की अर्हताएं टिकट हासिल करने के लिये जरूरी हैं वे सब रानी देवयानी में हैं। दूसरी बात, मैं ऐसे हर स्वाभाविक टिकटार्थी का समर्थन कर रहा हूँ जो भाजपा में है।

मसलन, मैं वैजयंती माला के टिकट का भी समर्थन कर रहा हूँ। वे भी टिकट मांग रही हैं। वे दलित हैं। दलितों पर तो पिछले दिनों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का खास अनुराग उमड़ता रहा है। वैजयंती माला भी विधायक की पत्नी हैं। इतना ही नहीं। दो बार विधानसभा का, एक बार भाजपा के टिकट पर, और एक बार ज़िला पंचायत अध्यक्ष का चुनाव खुद भी लड़ चुकी हैं। दो बार ज़िला पंचायत सदस्य रह चुकी हैं। पेशे से शिक्षिका हैं और उच्च शिक्षा प्राप्त हैं। ऐसा ही मामला मुख्यमंत्री के सलाहकार प्रोफेसर नरेंद्र सिंह का है। उनके नाम के साथ लगा प्रोफेसर उनके शिक्षित होने, मुख्यमंत्री का सलाहकार होना उनके राजनीतक और परिपक्व होने का अपना उदाहरण है। ज़ाहिर है कि उन्हें यह पद भाजपा ने ही दिया है और भाजपा टिकट के ही वे दावेदार हैं। तो टिकट दिए जाने में क्यों समस्या है? क्या यह कि ये सब स्थानीय हैं?

सवाल यह है कि इतने डिज़रविंग लोग जब हरिद्वार में ही उपलब्ध हैं तो फिर टिकट लेकर कहीं बाहर जाने की ज़रूरत क्या और क्यों है? यहाँ के लोगों को बाहर ले जाकर टिकट देने की ज़रूरत जब पार्टियां महसूस नहीं करती तो फिर ये ही ज़रूरत क्यों है? रहा सवाल कद-काठी का तो, भाजपा में तो खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस बात का उदाहरण हैं कि आदमी जिस पद पर रहता है उसी के अनुरूप कार्य करता है। मुख्यमंत्री रहते हुए मोदी राष्ट्रीय व्यक्तित्व थे और प्रधानमंत्री बनने के बाद अंतर्राष्ट्रीय व्यक्तित्व बन गए हैं। ऊपर की ओर देखना और काम करना आदमी की फितरत होती है। लेकिन इसके लिए मौक़ा मिलना ज़रूरी है। सवाल यह है कि मौक़ा तो मिले।

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