“मेरा बेटा कांग्रेस में गया है पाकिस्तान नहीं” भुवन चंद्र खंडूरी के इस बयान ने कांग्रेस को दे दिया बड़ा सहारा, भाजपा बैकफुट पर

533
views

एम हसीन / परम नागरिक 

 

2013 के बाद से ही जब राजनीति “कांग्रेसी = राष्ट्रविरोधी” और “भाजपाई = राष्ट्रवादी” पर चली आ रही हो और केवल कांग्रेसी ही नहीं बल्कि हर गैर-भाजपाई के सामने खुद को भारतीय साबित करने का सवाल मुंह बाए खड़ा हो, तब पूर्व केंद्रीय मंत्री, पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान भाजपा सांसद मेजर जनरल (ए वी एस एम, अवकाश प्राप्त) भुवन चंद्र खंडूरी के एक ही बयान ने मानो पूरी फ़ज़ा को बदल कर रख दिया है।

अपने बेटे मनीष खंडूरी के कांग्रेस गमन पर बार-बार उठ रहे सवाल का जवाब देते हुए खंडूरी ने केवल इतना कहा “मेरा बेटा कांग्रेस में गया है, कोई पाकिस्तान नहीं गया।” लेकिन इतने से ही हर उस आरोप का जवाब आ गया है जो भाजपा की ओर से पिछले पांच साल में बार-बार लगाया गया और जिसका जवाब न केवल कांग्रेसी बल्कि दिग्गज विपक्षी, गैर-भाजपाई विचारक तक नहीं दे पा रहे थे। खंडूरी के इस बयान को चुनौती देने की हैसियत सूबाई भाजपा का कोई नेता तो रखता नहीं। ज़ाहिर है कि शायद ही कहीं और से भी इसे चुनौती दी जा सके, खासतौर पर इसलिये कि खंडूरी केवल इतने पर ही नहीं रुके। उन्होंने आगे कहा “मेरा बेटा कांग्रेस में गया तो क्या हुआ, मेरी माँ भी तो कांग्रेसी ही थी।” अब उम्मीद की जा सकती है कि कांग्रेस के “अच्छे दिन” आ गए हैं। कारण जिन अच्छे लोगों ने कांग्रेस का नाम लेना छोड़ दिया था वे उसे अपनाने लगे हैं। भाजपा चाहे तो इसे अपनी उपलब्धि मान सकती है।

यह बहुत पुरानी बात नहीं है जब उत्तराखंड भाजपा के लिए खंडूरी ज़रूरी हुआ करते थे। 2007-2010 और फिर 2011-2012 के बीच सूबे के मुख्यमंत्री रहे खंडूरी 2012 के विधानसभा चुनाव में बाक़ायदा भाजपा का नारा थे। तब कहा जाता था कि “खंडूरी हैं ज़रूरी।” ऐसा बेवजह नहीं था। 18 साल कुछ महीनों की आयु रखने वाले उत्तराखंड में खंडूरी के कार्यकाल को सबसे साफ़-सुथरा माना जाता है। बेशक उन्होंने भाजपा की रीतियों-नीतियों का भी ख्याल रखा था लेकिन लेकिन वे एक अच्छा प्रशासन देने में भी कामयाब रहे थे। खंडूरी भाजपा में अटल बिहारी वाजपेयी की खोज थे। वे उन लोगों में एक थे जिन्होंने उस समय अछूत मानी जाने वाली भाजपा को समाज में स्वीकारोक्ति दिलाने में अपना योगदान दिया था, जिनके कन्धों पर सवार होकर भाजपा ने लोकसभा में अपने ग्राफ को 2 से 86 तक और फिर 282 तक पहुंचाया था।

कोई बड़ी बात नहीं कि नरेंद्र मोदी की भाजपा में इसीलिये खंडूरी अप्रासंगिक हुए थे कि वे अटल बिहारी वाजपेयी की खोज थे। सब जानते हैं कि 2018 तक अटल बिहारी वाजपेयी का नाम लेकर मोदी ने आडवानियों, जोशियों, भागवतों को किनारे किया था और अब वे वाजपेयीयों को किनारे लगा रहे हैं। भाजपा प्रत्याशियों की पहली सूची अगर दो दिनों से अटकी हुई है तो यह बेवजह नहीं है।

बहरहाल, जो हालात हैं उनमें खंडूरी का नंबर आना ही था। लेकिन मोदी की भाजपा ने जो नहीं सोचा था वह यह है कि जो खंडूरी अछूत भाजपा को स्वीकृत कराने में अपना योगदान दे सकते हैं वे यही काम दूसरे के लिए भी कर सकते हैं। दरअसल, खंडूरी का प्रभाव राजनीतिक चाहे जितना हो लेकिन सामाजिक रूप से पूरा है। उनका प्रभाव प्रतीकात्मक है और कितना है इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि खंडूरी के एक ही ब्यान से सूबाई भाजपा को सांप सूंघ गया है। अब भाजपा खंडूरी को तो राष्ट्रद्रोही नहीं बता सकती न। ज़ाहिर है कि मझदार में फंसी कांग्रेस के लिए खंडूरी का यह बयान ही पतवार बन गया है। मौजूदा हालात में यह बात कांग्रेस की भी समझ में आ गई होगी कि उसे किस चीज़ की ज़रूरत थी।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here