हरीश रावत का हरिद्वार कांग्रेस के लिये योगदान – बिना चैंपियन के भी दिया तीन विधायकों का तोहफा

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एम हसीन / परम नागरिक 

 

 

2009 से पहले हरिद्वार जनपद में कांग्रेस की क्या हैसियत थी? जवाब है शून्य?
2002 के विधानसभा चुनाव में यहाँ कांग्रेस का कोई प्रत्याशी विजयी नहीं हुआ था। 2002 में तिवारी सरकार बन जाने के बाद हरिद्वार, मंगलौर और लंढोरा में उसके नगर प्रमुख बने थे जो 2008 में सब हार गए थे या चुनाव ही नहीं लड़े थे। इससे पहले 2007 में प्रणव सिंह चैंपियन ने लक्सर सीट कांग्रेस के लिये जीती थी। यह चैंपियन की व्यक्तिगत जीत थी क्योंकि 2002 में वे निर्दलीय भी जीत चुके थे।

फिर 2009 में यहाँ हरीश रावत की एंट्री हुई थी। वे शानदार समर्थन के साथ यहां सांसद बने थे। इसी के बाद 2012 में चैंपियन समेत पार्टी के तीन विधायक चुने गए थे। यूँ पहली बार हरिद्वार ज़िले की कांग्रेस को राज्य की व्यवस्था का हिस्सा बनने का मौक़ा मिला था। 2017 से पहले ही पार्टी के दो विधायक चैंपियन और प्रदीप बत्रा भाजपा गमन कर गए थे। इसके बावजूद पार्टी के तीन विधायक दोबारा जीतकर आये थे।

हालाँकि यह हकीकत है कि इसी चुनाव में हरीश रावत व्यक्तिगत रूप से चुनाव हार गए थे। फिर भी, वे कांग्रेस के उस आत्मविश्वास को जगाने में कामयाब रहे थे जो किसी राजनीतिक दल को जीत की राह पर लेकर जाता है। 2017 में कांग्रेस मैदान से लेकर पहाड़ तक सामान रूप से हारी थी क्योंकि नरेंद्र मोदी का जादू सर चढ़कर बोल रहा था, अन्यथा यह जीत ज़्यादा भी हो सकती थी।

दरअसल, कांग्रेस की एक खास मानसिकता है जो हर किसी पर लागू होती है। वह मानसिकता यह है कि “मैं पार्टी का सर्वे-सर्वा रहूं, पार्टी रहे या नहीं रहे।” इस मानसिकता से न तो राहुल गांधी बरी हैं न हरिद्वार ज़िला कांग्रेस के मौजूदा सर्वे-सर्वा डा. संजय पालीवाल। आखिर यह भी तो हक़ीक़त है कि हरिद्वार ज़िले में कांग्रेस का सबसे बुरा दौर वही था जब पालीवाल इसके जिलाध्यक्ष थे। अब ज़ाहिर है कि इसी मानसिकता से हरीश रावत भी ग्रस्त हैं।

लेकिन एक फ़र्क़ भी है। फ़र्क़ यह है कि हरीश रावत महत्वकांक्षी हैं। उन्हें सिर्फ राजनीति नहीं करनी बल्कि मुख्यमंत्री भी बनना है। इसके लिए जब वे प्रयास करते हैं तो पार्टी को नुकसान होता है तो फायदा भी होता है। इसके विपरीत पालीवाल को न चुनाव लड़ना और न मंत्री या मुख्यमंत्री बनना। फिर उनके कार्यकाल में पार्टी का इक्का-दुक्का चुनाव जीत जाना ही बड़ी घटना होती है। जैसे इस बार हरिद्वार में कांग्रेस का मेयर जीत जाना। लेकिन यह क्या बेवजह है? इसमें क्या इस बात की कोई भूमिका नहीं है कि हरिद्वार भाजपा की राजनीति की भीतरी आवश्यकता क्या है? यही लोकसभा चुनाव का मामला है। पार्टी के कई लोगों को लगता है कि इस बार हरिद्वार में कांग्रेस का सांसद बन जाना संभव है क्योंकि भाजपा की भीतरी राजनीति की ज़रूरत इस बार ऐसी ही है। अहम बात यह है यह मुर्दा पार्टी को ज़िंदा करके सांसद बनने की हरीश रावत की योग्यता या क्षमता का मसला नहीं है।

बहरहाल, अभी यही तय नहीं है कि हरीश रावत का टिकट कट रहा है। लेकिन यदि उनका टिकट कटता भी है तो इससे किसी बहुत बड़े बदलाव की उम्मीद नहीं की जानी चाहिए।

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