सरकार पर बेयकीनी क्यों?

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    एम हसीन / परम नागरिक 
     
    आतंकवाद, पुलवामा, सर्जिकल स्ट्राइक आदि के बीच कई चीज़ें एकाएक मंज़रे आम पर आई जो मैंने सोशल मीडिया समेत विभिन्न माध्यमों पर देखी और समझी।  मसलन, एक चीज़ सरकार का समर्थन और विरोध देखा। करने वालों ने पुलवामा हमले पर भी सरकार का विरोध करने, सरकार के तौर-तरीकों और सरकार की नीयत पर सवाल उठाने का मौक़ा नहीं गंवाया और समर्थन करने वालों ने विंग कमांडर अभिनदंन के पाकिस्तानी क़ब्ज़े में होने के बावजूद सरकार की प्रशंसा में कसर नहीं छोड़ी। इस सबके बीच मेरे मन में यह सवाल उठा कि यूँ सक्रिय रहने वाले लोगों में कितने सरकार के वास्तविक विरोधी और कितने वास्तविक समर्थक होंगे? 
     
    यहाँ मैं हमले से लेकर सर्जिकल स्ट्राइक तक के मामलों की वास्तविक जानकारी का सवाल नहीं उठा रहा हूँ। ऐसी घटनाओं की वास्तविक व संपूर्ण जानकारी न तो सोशल मीडिया पर सक्रिय रहने वाले लोगों को हो सकती है और न ही टी वी के स्टूडियो या अख़बारों के दफ्तर में बैठकर हालात की समीक्षा करने वाले को। ऐसी जानकारी केवल सरकार को हो सकती है। पिछले पूरे एक पखवाड़े का यह भी एक अहम मामला रहा कि सरकार ने अपनी जानकारी देश के साथ उस तरह साझा ही नहीं की जिस तरह की जानी चाहिए थी। सरकार या निंदाओं में व्यस्त रही या फिर जवाबी कार्यवाही के दावों में। चूँकि सवाल आतंकी हमले का था इसलिये विपक्ष के पास भी इसकी निंदा करने और सरकार के साथ खड़े होने के अलावा कोई चारा नहीं था। 
     
    यही दरअसल इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है और इसका सीधा संबंध मेरे सवाल से है। इतने महत्वपूर्ण मसले पर भी जब “देश” बहस केंद्र में न हो, जब “समर्थन और विरोध” केवल “सरकार” का ही हो रहा हो तो फिर किस चीज़ की गुंजाईश बचती है? मैं नहीं कहता कि मेरा यह आंकलन पूरे तौर पर सही है। इसमें कुछ त्रुटि रही हो सकती है, इसलिए मैं स्वागत करूँगा अगर कोई ऐसा करता है तो।
     
    इस बीच आगे बढ़ते हुए मैं एक और चीज़ पर चर्चा करना चाहता हूँ। वह यह कि इस समर्थन और विरोध के हालात क्या खामखाह बन गए हैं? क्या सरकार इस बात से वाकिफ नहीं कि देश के भीतर ही समाज का एक बड़ा वर्ग उसके हर काम को, हर बात को संदेह की नज़र से देख रहा है? फिर सरकार को इस बात की चिंता क्यों नहीं है कि उसकी विश्वसनीयता पर सवाल न उठे? क्या ऐसा नहीं लगता कि सरकार जान-बूझकर ऐसा कर रही है? क्या ऐसा नहीं लगता कि सरकार जानबूझकर खुद को कठघरे में खड़ा कर रही है अपने उस समर्थन के भरोसे जो उसे समाज के ही दूसरे वर्ग के बीच मिल रहा है? क्या ऐसा नहीं लगता कि सरकार की ऐसी मंशा है कि लोग उसके किसी काम पर यकीन न करें ताकि उसपर कुछ सही करने का दबाव ही न हो? या कल उन सवालों का भी महत्व न रह जाए जो सही लोग, सही परिप्रेक्ष्य में, सही के लिए उठाएं? 
     
    क्या यह नहीं होना चाहिये कि लोग सरकार को उसकी हद तक लेकर जाएँ, उसकी हर बात पर ईमानदारी से यकीन करें और ऐसा यह सोचकर करें कि सरकारें आती-जाती चीज़ हैं। लेकिन समाज, देश रहने वाली चीज़ें हैं। समाज बेशक सरकारें बदलने की हैसियत रखता है लेकिन सरकारें समाज को तबाह करने की हैसियत भी रखती हैं। अगर किसी को इस बात पर संदेह हो तो वह पिछले तीस सालों में बनी और निपटी सरकारों का और समाज का आंकलन कर ले।

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