हरीश रावत को अब हरिद्वार से क्या है उम्मीद? – क्या भाजपा के लिए गुंजाईश बनाये रखना चाहते हैं पूर्व मुख्यमंत्री?

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एम हसीन / परम नागरिक 
अलंकारिक भाषा बोलने के आदी हो चुके हरीश रावत के बयानों का यूँ मतलब समझना आसान नहीं होता। उनके किसी बयान से अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि वे हरिद्वार लोकसभा सीट पर कांग्रेस टिकट के दावेदार हैं या नहीं। अलबत्ता कांग्रेस प्रवक्ता श्री गोपाल नारसन ऐसा कहते हैं। वे कहते हैं कि रावत भी यहाँ टिकट के दावेदार हैं।
बहरहाल, अगर वे हैं तो यह भारी ताज्जुब की बात है। सवाल यह है कि किस हासिल की उम्मीद में वे ऐसा सोच रहे हैं? वो कौन सी बात है जो उन्हें यकीन दिलाती है कि वे कम से कम फिलहाल यहाँ संसदीय चुनाव जीतने की स्थिति में हैं? हालिया इतिहास पर गौर करके तो नहीं लगता कि उनके लिए कहीं कोई सम्भावना बन रही है! बात केवल इतनी ही नहीं कि फिल्हाल ज़िले में स्थानीय प्रत्याशी की मांग तूफान बनती जा रही है। इस मांग पर प्रतिक्रिया की बचकाना पहल करके रावत हालाँकि खुद ही ज़ाहिर कर चुके हैं कि वे खुद को इस मुद्दे पर भाजपा सांसद डा. रमेश पोखरियाल निशंक से कहीं अधिक कमज़ोर जहाज़ मानते हैं। बहरहाल, फिलहाल यह अहम बात नहीं। अहम बातें और भी हैं जिनमें जनता के स्तर पर चला आ रहा उनका व्यक्तिगत विरोध सबसे अहम है।
बात 2014 के चुनाव की नहीं है। तब उनकी कांग्रेस प्रत्याशी पत्नी रेणुका रावत का पौने दो लाख वोटों से हार जाना मोदी की आंधी का सबब हो सकता है। लेकिन 2017 में भी ऐसा ही था, यह गले से उतरने वाली बात नहीं है। 2017 में हरीश रावत हरिद्वार देहात सीट पर व्यक्तिगत रूप से विधानसभा चुनाव हार थे। तब स्पष्ट हुआ था कि उन्हें केवल नरेंद्र मोदी, डा. रमेश पोखरियाल निशक या बाबा रामदेव के प्रभाव में आये बहुसंख्यक समुदाय के लोगों ने ही नहीं बल्कि इन सबके विरोधी मुस्लिम समुदाय ने भी पूरे तौर पर नाकारा था। यह स्थिति तब बनी थी जब मुख्यमंत्री रहते हरीश रावत ने मुख्यमंत्री राहत कोष की रेवड़ियां यहां जमकर बांटी थी।
तब सबसे शानदार परिणाम रुड़की और खानपुर सीट का रहा था। यहाँ प्रदीप बत्रा और प्रणव सिंह चैंपियन ने भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ा था जो 2016 तक कांग्रेस के ही विधायक थे और उन 9 विधायकों का हिस्सा थे जिन्होंने उनकी सरकार गिराई थी। तब सुप्रीम कोर्ट ने जो चाहे निर्णय दिया हो, जनता ने अपना निर्णय दिया था। पाठकों को याद होगा कि सरकार गिरने के बाद हरीश रावत इन दोनों विधानसभा क्षेत्रों में पदयात्रा निकालने आये थे और दोनों ही क्षेत्रों में उन्हें टिकट के चंद दावेदारों, लालबत्ती के कुछ उम्मीदवारों और कुछ सजातियों के अलावा किसी और का कुछ खास समर्थन नहीं मिला था। जनता का समर्थन तो उन्हें बिलकुल भी नहीं मिला था।
अपना यही निर्णय जनता ने 2017 में चुनाव में सुनाया था। तब रावत की तमाम अलंकारिक भाषा, तमाम जोड़तोड़, तमाम जुगाड़बाज़ियों के बावजूद प्रदीप बत्रा और चैंपियन को पहले से दोगुना समर्थन और पहले से अधिक अंतर की जीत हासिल हुई थी। आज भी दोनों विधायक अपने-अपने क्षेत्र की जनता के हीरो हैं जबकि हाल ही में यहाँ गन्ना-गंगा यात्रा करने आये हरीश रावत को खानपुर विधानसभा क्षेत्र में उदय पुंडीर के अलावा किसी और का समर्थन नहीं मिला। रुड़की विधानसभा क्षेत्र में तो उन्हें एक-इकलौता कार्यकर्त्ता स्वागत करने के लिए भी नहीं मिला।
उपरोक्त से यह ज़ाहिर है कि भाजपा का गढ़ माने जाने वाले इस संसदीय क्षेत्र में न सिर्फ कांग्रेस का बल्कि हरीश रावत का व्यक्तिगत, ज़बरदस्त, विरोध है। अब, किसी सूरत में यह हो सकता है कि कांग्रेस को तो लोग फिर भी अपना लें, लेकिन रावत को अपनाने के हालात कम से कम फिलहाल तो बिलकुल भी नहीं हैं। ऐसे में अपने चुनाव जीत जाने की उम्मीद तो शायद रावत खुद भी यहां नहीं करते होंगे। फिर किस उम्मीद में वे हरिद्वार में टिकट पर दावा कर रहे हैं? क्या इसलिये की उनकी मौजूदगी यहाँ हर हाल में भाजपा की जीत सुनिश्चित करेगी? या इसलिये कि उनकी उम्मीदवारी तय होने के बाद स्थानीय नेतृत्व के लंबे समय तक दबे रहने के हालात बने रहेंगे? आखिर कुछ तो वजह ज़रूर होगी जो रावत हार का जोखिम लेकर भी यहाँ चुनाव लड़ने का पुख्ता इरादा रखते बताए जा रहे हैं?

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