अब अपनी राजनीति करेंगे जिले के कई कद्दावर नेता

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एम हसीन
हरिद्वार। हरिद्वार में भाजपा और कांग्रेस की एकाधिकारवादी नूराकुश्ती से आजिज आए जिले के कई वरिष्ठ और प्रभावशाली नेता अब सत्ता का तीसरा केन्द्र बनाने की स्थितियों पर गौर कर रहे हैं। प्रभावशाली और लोकप्रिय होने के बावजूद राजनीतिक दलों द्वारा अपने हितों और स्वार्थों के लिए फेंटे और दुहे जाने वाले ये नेता अब दलों की नहीं बल्कि अपनी राजनीति करने की सम्भावनाओं पर गौर कर रहे हैं। नेताओं की इस बदली मानसिकता का प्रमाण हो सकता है कि आसन्न निकाय चुनाव में ही दिखाई दे जाए, यदि ऐसा नहीं हुआ तो अगले लोकसभा चुनाव तक तो हर हाल में इसे एक निश्चित दिशा मिलनी तय है।
सूबे की सियासत में कांग्रेस हो या भाजपा, दोनों के लिए ही हरिद्वार जिले के नेता दुधारू गाय बन गए हैं। चूंकि स्थानीय नेताओं में आपसी प्रतिस्पर्धा का भाव बहुत अधिक है इसलिए एक ओर उनकी अधिकतम ऊर्जा एक दूसरे की जड़ें काटने में खर्च हो रही है। दूसरी ओर जिले पर दोनों दलों के चुनिन्दा नेताओं का एकाधिकार हो गया है। यह खासी विड़म्बना पूर्ण और लोमहर्षक स्थिति है कि पर्दे के पीछे कांग्रेस और भाजपा में कोई अन्तर नहीं रह गया है। दोनों दलों में गुटबाजी चरम पर है और दोनों दलों के गुटों की परस्पर एकता ने दलगत भावना को समाप्त कर दिया है। स्थिति को यूं समझा जा सकता है कि स्थानीय भाजपा सांसद डा- रमेश पोखरियाल निशंक का जितना मजबूत गुट भाजपा के भीतर है उतना ही मजबूत गुट उनका कांग्र्रेस के भीतर भी है। यही स्थिति डा- रमेश पोखरियाल निशंक के पार्टी के भीतर विरोधी गुट की है। उस गुट को उतना ही अधिक मजबूत समर्थन कांग्रेस के भीतर हासिल है। दरअसल, कांग्रेसी भाजपाईयों की मदद से कांग्रेसियों का कद छांट रहे हैं तो भाजपाई कांग्रेसियों की मदद से भाजपाईयों की जड़ों में मठ्ठा दे रहे हैं। ऐसे में बसपा तीसरी ताकत बन सकती थी लेकिन वह कहीं भाजपा और कहीं कांग्रेस का खिलौना बनकर रह गई है।
यही वह स्थिति है जिसने जिले के दमदार नेताओं को राजनीति पर नए सिरे से सोचने का दबाव बनाया है। ऐसे नेता जो भरपूर जनसमर्थन और साधन सम्पन्न हैं वे भी उपरोक्त राजनीति में मोहरों के सिवाए कुछ और नहीं बन पा रहे हैं। विड़म्बना यह है कि सवाल चाहे पार्टियों में पद हासिल करने का हो और चाहे टिकट हासिल करने का, इन नेताओं को राजनीतिक रूप से भी अपनी हैसियत साबित करना पड़ती है और आर्थिक रूप से भी। इसके बावजूद अकसर मौके पर इनके हाथ खाली रह जाते हैं। राजनीतिज्ञों पर व्यवसायियों को बढ़ावा देने में जुटे दोनों दलों के नेता पदों और टिकटों का सौदा किन्हीं और लोगों के साथ किन्हीं और तरीकों से कर लेते हैं। 2017 के विधानसभा चुनाव में टिकट से निराश हुए ऐसे कई लोग अब अपने दम पर अपनी राजनीति की दिशा तय करने की सम्भावनाओं पर गौर कर रहे हैं। यदि ऐसा होता है तो यह हरिद्वार की राजनीति के लिए एक अलग परिदृश्य होगा।

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