डा- शमशाद हारे तो खत्म हो जाएगा दोनों का कैरियर

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संवाददाता
मंगलौर। पूर्व विधायक हाजी सरवत करीम अंसारी ने बसपा के समानांतर अपना प्रत्याशी मैदान में उतारकर बेहद जोखिम भरा फैसला लिया है। चूंकि उनके प्रत्याशी डा- शमशाद के सामने हाजी का तेली प्रेम समस्या पैदा कर रहा है, इसलिए यह निश्चित है कि यदि चुनाव परिणाम उनके विपरीत हुआ तो यह केवल प्रत्याशी के लिए ही नहीं बल्कि उसके गॉडफादर के कैरियर पर भी फुल स्टाप साबित होगा। अहम बात यह है कि जिन निवर्तमान नगर पालिका अध्यक्ष चौ- इस्लाम को यह जोड़ी चुनौती दे रही है उनके चुनाव अभियान की कमान कांग्रेस विधायक काजी निजामुददीन के हाथ में है। संघर्ष के शुरूआती दौर में ही चौ- इस्लाम का पलडा भारी दिख रहा है और यह स्थिति तब है जब राजस्थान प्रदेश सह प्रभारी के रूप में काजी निजामुददीन फिलहाल तक राजस्थान विधान सभा चुनाव में व्यस्त हैं। मुददे पर आगे चर्चा करने से पहले जान लें कि चौ- इस्लाम और डा- शमशाद दोनों ही तेली बिरादरी से आते हैं, जबकि हाजी सरवत करीम अंसारी नाम से ही जाहिर है कि अंसारी बिरादरी से हैं। उपरोक्त दोनों प्रत्याशियों के अलावा यहां बसपा के टिकट पर जुल्फिकार अंसारी और भाजपा के टिकट पर जमीर अंसारी चुनाव लड़ रहे हैं। 2008 में भाजपा के टिकट पर निकाय चुनाव लड़ चुके कलीम अंसारी की पत्नी भी मैदान में हैं जो कि बसपा प्रत्याशी जुल्फिकार अंसारी की भाभी हैं। प्रत्याशी यहां और भी कईं हैं लेकिन उल्लेखनीय यही हैं। हाजी सरवत करीम अंसारी पिछला विधानसभा चुनाव बसपा के टिकट पर हारे थे और बसपा के साथ-साथ अंसारी बिरादरी ने भी यह उम्मीद की थी कि चुनाव में वे अंसारी प्रत्याशी का ही समर्थन करेंगे। लेकिन यह राजनीतिक रूप से स्वाभाविक नहीं होता इसलिए अपने खास तेली बिरादरी के डा- शमशाद के पक्ष में पार्टी से किनारा करने का हाजी सरवत करीम अंसारी का फैसला तो सही है लेकिन उनके इस एक फैसले ने अंसारी बिरादरी को डा- शमशाद के विरोध में खड़ा कर दिया है, ऐसा बताया जा रहा है। यदि ऐसा नहीं भी होता तो भी जाहिर है कि अंसारी बिरादरी ने बंटवारा तो लाजमी हो गया है। यूं चुनाव मुख्य रूप से गैर अंसारी बिरादरियसों में ही घूम जाए ऐसे हालात बने हुए दिखाई दे रहे हैं। लेकिन मसला तेली बिरादरी का भी है। जिले की तेली राजनीति को प्रभावित करने वाले पूर्व विधायक मु- शहजाद डा- शमशाद को फूटी आंख देखने को तैयार नहीं। यह डा- शमशाद को अपनी बिरादरी में ही कमजोर दिखाने वाला दृष्टिकोण है। फिर यह भी सच है कि पिछले विधानसभा चुनाव में हाजी सरवत करीम अंसारी खुद अपनी अंसारी बिरादरी के बीच भी कमजोर साबित हुए थे जबकि काजी निजामुददीन न केवल गैर अंसारी मतों में बल्कि अंसारी मतों में भी सेंधमारी करने में कामयाब रहे थे। उपरोक्त हालात में जो तस्वीर बनती है वह यह तो दिखाती है कि हाजी सरवत करीम अंसारी के सामने यही इकलौता विकल्प था लेकिन यह भी साबित करती है कि यह विकल्प उनके लिए बेहद जोखिम भरा है। डा- शमशाद की हार अगर होती है तो हाजी का कैरियर भी खत्म हो जाएगा।

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