सब कुछ नकारात्मक होने पर भी खामोश हैं भाजपाई

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नागरिक ब्यूरो
रुड़की। कांग्रेसियों को आदत नहीं है जनहितों को लेकर संघर्ष करने की।
अव्वल तो कांग्रेस ने संघर्षशील कार्यकर्ता ही नहीं, यदि दूसरे दलों से
ऐसे कार्यकर्ता आए भी हैं तो उनके नाखून और दांत भी कांग्रेस ने आते ही
कुंद हो गए हैं। लेकिन भाजपाईयों की स्थिति ऐसी नहीं है। भाजपाईयों को
सड़क पर उतरकर संघर्ष करने की आदत है। गैस की कीमतों में बढोत्तरी का सवाल
हो या पेट्रोल डीजल की कीमतों में, कानून व्यवस्था का मसला हो या
भ्रष्टाचार का, घपले घोटालों का खुलासा हो या संवैधानिक संस्थाओं के साथ
राजनीतिक खिलवाड़ का, भाजपाई हमेशा सड़कों पर आकर संघर्ष करते रहे हैं और
यूं उन्होंने अपने आपको राष्ट्र निष्ठ साबित किया है। लेकिन कमाल की बात
है कि पिछले साढे चार साल में केन्द्र के और पिछले डेढ साल में राज्य के
किसी भी फैसले के विरोध में भाजपाई सड़कों पर नहीं आए हैं। जनता उनकी ओर न
केवल उम्मीद भरी नजर से देख रही है बल्कि इस बात पर ताआज्जुब भी कर रही
है कि इतना लम्बा अरसा कैसे भाजपाई खामोशी से गुजार पाए हैं। यह उनका
पार्टी के प्रति डिवोशन (समर्पण) है या फिर एडिक्शन (लत)।
एक समय था जब उत्तराखण्ड में भाजपा, कांग्रेस व बसपा के साथ सपा भी
सक्रिय थी। जातिवादी राजनीति के लिए मशहूर बसपा को जनहितों के लिए संघर्ष
करने की कभी जरूरत नहीं पड़ी। तथाकथित अगड़े समाज के लोग अम्बेडकर
प्रतिमाओं के साथ छेड़छाड़ और दलित राजनीति पर ब्यान देकर पार्टी को मजबूत
करने का काम करते रहे हैं। लेकिन सपा की स्थिति ऐसी नहीं थी। खासतौर पर
जब तक नगर सपा में मुनेश त्यागी सक्रिय थे तब तक सपा हर मुददे को लेकर
सड़क पर उतरती थी। पार्टी को नगर या देहात की समस्याओं के साथ साथ सभी
वर्गोे की समस्याओं पर संघर्ष करते हुए आम देखा जाता था। धीरे-धीरे सपा
समाप्त हो गई। पार्टी के कभी सूबाई क्षत्रप रहे पूर्व मंत्री राम सिंह
सैनी और पूर्व विधायक अम्बरीश कुमार आदि के कांग्रेस गमन के बाद मुनेश
त्यागी जैेस संघर्षशील कार्यकर्ता भी आखिरकार कांग्रेस में जाकर अपना
वजूद खो बैठे।
संघर्ष के मामले में कांग्रेस के नाम कोई उपलब्धि कभी दर्ज नहीं होगी तो
इंदिरा गांधी के समय में ही रही होगी। बाद में एयरकंडीशनर संस्कृति ने
कांग्रेस पर कब्जा कर लिया। फिलहाल स्थिति यह है कि जब कांग्रेस सत्ता
में होती है तो कांग्रेसी भाजपाईयों के हित साधते हैं और जब भाजपा सत्ता
में होती है वे भाजपाईयों के साथ तालमेल कर के अपने हित साधते हैं। जनता
के हितों से उनका सरोकार न तब होता जब वे सत्ता में होते हैं और न तब
होता है जब वे विपक्ष में होते हैं।
मगर भाजपा पर यह बात लागू नहीं होती। भाजपा के पास विशाल कार्यकर्ता वर्ग
है जिसका जनहितों से सीधा सरोकार दिखाई देता है। चाहे जीएसटी का मामला
हो, चाहे एफडीआई का, चाहे महंगाई को हो, चाहे भ्रष्टाचार का भाजपाई सड़कों
पर उतर कर संघर्ष करने के आदी हैं। जनवरी 2017 से पहले तक जनता भाजपाईयों
को लगभग हर रोज सड़कों पर संघर्षरत देखती थी और इस बात के लिए बकायदा उनकी
प्रशंसा करती थी कि वे अपनी सुख सुविधा छोड़कर तपती धूप में या कड़ाके की
ठंड़ में संघर्ष कर रहे हैं। इसका पार्टी को फल भी मिला। वह 2014 में पहले
ही स्पष्ट बहुमत के साथ सरकार बना चुकी थी, उसे 2017 में जनता ने सूबाई
विधानसभा में दो तिहाई बहुमत दिया। लेकिन न तो केन्द्र सरकार जनता की
अपेक्षाओं पर खरा उतर पा रही है और न ही सूबाई सरकार। ऐसे में जनता को
कांग्रेस और बसपा से तो कोई उम्मीद नहीं है। मगर भाजपाईयों की ओर वह
उम्मीद भरी नजरों से देख रही है। जनता के मन में सवाल उठ रहा है कि
भाजपाईयों का समर्पण पार्टी के लिए है या जनता के लिए?

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