मंगलौर में मुक़ाबिल पुराने रक़ीब इस्लाम – शमशाद की हदों से बाहर नहीं चुनाव

267
views
एम हसीन / परम नागरिक 
मंगलौर – बसपा के बागी डॉ. शमशाद की सोच यह है कि “रकाबतों की सफें तोड़कर बढ़ो वर्ना, जो तुमसे आगे हैं वो रास्ता नहीं देंगे।” लेकिन उनकी समस्या यह है कि इस तरह की रक़ाबत में आमतौर पर आखिर में मायूसी हासिल होती है क्यों कि पुरानी कहावत यह है कि “जो मारे सो मीर।” डॉ. शमशाद के रक़ीब चौ. इस्लाम उनसे इस मामले में एक क़दम आगे खड़े हैं कि वे कांग्रेस का टिकट की लड़ाई जीत चुके हैं, जबकि डॉ. शमशाद बसपा टिकट की बाजी हार चुके हैं। चाहे इसका कोई राजनीतिक मतलब न हो, चाहे बसपा प्रत्याशी ज़ुल्फ़िक़ार अंसारी की कहीं गिनती न हो रही हो, फिर भी इसका एक नैतिक, मनोवैज्ञानिक मतलब है। वह मतलब यह है कि डॉ. शमशाद ने अपनी लड़ाई हार के साथ शुरू की है।
मंगलौर क़स्बे में दलों, मुद्दों, विचारों का नहीं व्यक्तित्वों का संघर्ष है। एक व्यक्तित्व मौजूदा कांग्रेस विधायक क़ाज़ी निजामुद्दीन हैं और दूसरा व्यक्तित्व पूर्व विधायक हाजी सरवत करीम अंसारी हैं।  हालात बड़ी दिलचस्प कहानी कहते हैं। पिछले निकाय चुनाव में हाजी बसपा विधायक थे और उन्होंने आसानी से डॉ. शमशाद को पार्टी टिकट दिला दिया था। दूसरी और क़ाज़ी निज़ामुद्दीन कांग्रेस के पूर्व विधायक थे और वे चौ. इस्लाम को टिकट दिलाने में नाकाम हो गए थे। लेकिन चुनावी परिणाम चौ. इस्लाम के पक्ष में गया था। यानि जनता का आशीर्वाद क़ाज़ी निजामुद्दीन को मिला था। ज़ाहिर है इतिहास चेहरों के बदलाव के साथ दोहराव के मोड़ पर खड़ा है लेकिन एक बदलाव के साथ। हाजी अपनी बिरादरी में एकछत्र नेता का संदेश नहीं दे पाए। बसपा का टिकट जिन ज़ुल्फ़िक़ार अंसारी को मिला है वे और भाजपा का टिकट जिन ज़मीर हसन अंसारी को मिला है वे, हाजी के सजातीय ही हैं। यह वह लड़ाई है जो हाजी हारे हैं हैं। इसके विपरीत क़ाज़ी निजामुद्दीन विभिन्न बिरादरियों में बिखरे अपने सारे समर्थकों को चौ. इस्लाम के साथ जोड़कर रखने में कामयाब हैं। कहने का मतलब यह है कि हार के साथ सिर्फ डॉ. शमशाद ही नहीं उनके गॉड फादर हाजी सरवत करीम अंसारी भी मैदान में आये हैं। बहरहाल, नतीजा कुछ भी हो, तय है कि चुनाव इस्लाम-शमसाद की हदों से बाहर नहीं है। मुकाबला इन्हीं दोनों के बीच होना है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here