मुश्किल है इस तस्वीर का बदलना पूर्वाग्रह तो टूट जाये, ज़िद्द कैसे जाय ?

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एम हसीन / परम नागरिक 
मैं कांग्रेस विरोधी मानसिकता का आदमी हूँ। कांग्रेस के बारे में मैं चाहकर भी अच्छा नहीं सोच पाता। लेकिन मेरी आँखों पर पट्टी नहीं बंधी है। आज उन सज्जन ने भरी महफ़िल में अपने भाजपा प्रेम के दो कारण बताये। एक, कांग्रेस के दामन पर 1984 के सिख विरोधी दंगे के दाग़। दो, केवल गांधी परिवार के व्यक्ति को हर हाल में प्रधानमंत्री बनाने की कांग्रेस की जिद्द। मैं मौके पर खामोश रहा। लेकिन बात मुझे कचोट रही है। मैं समझाने की कोशिश करता हूँ। लेकिन पहले जान लें कि ये भजपा प्रेमी सज्जन धर्म से सिख हैं।
1984 के सिख-विरोधी दंगे का कांग्रेस के दामन पर दाग़ है। दाग़ ग़लत नहीं है। लेकिन मेरा सवाल यह है कि यह दाग़ क्या सिर्फ कांग्रेस के दामन पर है? इतिहास गवाह है कि इस दंगे के बाद हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को 417 लोकसभा सीटों पर जीत हासिल हुई थी। उत्तर, मध्य व पश्चिम भारत में किसी दल के लिए कोई गुंजाईश नहीं बची थी। भाजपा की अवाजो (अडवाणी, वाजपेयी, जोशी) तिकड़ी बुरी तरह हारी थी। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने खुलकर कांग्रेस की मदद की थी। ऐसे में इस दंगे को केंद्र में रखकर कोई कांग्रेस से नफरत करे यह तो समझ में आता है लेकिन संघ-भाजपा, जो इस बल्कि हर दंगे के बराबर के दोषी हैं, का समर्थन करे, कम से कम मेरे लिए यह ताज्जुब की बात है।
दूसरी बात, बेशक कांग्रेस के सत्ताकाल में पंडित जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी प्रधान मंत्री रहे लेकिन लाल बहादुर शास्त्री, नरसिम्हाराव व मनमोहन सिंह भी तो प्रधानमंत्री रहे हैं। इनमें कौन नेहरू-गांधी परिवार से था? दूसरी बात, शास्त्री को न जनता ने हटाया न कांग्रेस ने। वे बनने के बाद जीवन पर्यंत प्रधानमंत्री रहे। इसी प्रकार राव और मन को क्रमश: 5 व 10 साल में जनता ने हटाया। बीच में प्रधानमंत्री बदलने का काम कांग्रेस ने कभी नहीं किया। अब 2019 का चुनाव सामने है। यह स्पष्ट नहीं है कि कांग्रेस जीतेगी तो प्रधानमंत्री राहुल गांधी ही बनेंगे। फिर भी, यह नहीं कहा जा सकता कि कांग्रेस ने केवल नेहरू-गांधी परिवार के बाहर कभी प्रधानमंत्री नहीं ढूंढा। इसलिये मैं तो मानता हूँ कि जो काम पहले हो चुका हो उसके दोबारा होने की सम्भावना हमेशा ही रहती है। फिर यह कोई बात नहीं कि राहुल गांधी सिर्फ इसलिए प्रधानमंत्री न बनें कि वे नेहरू-गांधी परिवार से आते हैं। इसके बावजूद अगर कोई कहता है तो वह पूर्वाग्रही नहीं बल्कि ज़िद्दी ही हो सकता है। या फिर इसका कोई खास कारण भी हो सकता है। मसलन, दो साल पहले तक राहुल गांधी को उतना मूर्ख नहीं बताया जा रहा था जितना अरविन्द केजरीवाल को बताया जा रहा था। वजह साफ़ है। पंजाब-गोवा के चुनाव से पहले केजरीवाल स्वाभाविक नेतृत्व दीख रहे थे। कांग्रेस की मदद से संघ केजरीवाल को कमज़ोर कर चुका है। अब राहुल स्वाभाविक नेतृत्व दीख रहे हैं। इसलिए उन्हें पप्पू बताया जा रहा है। मेरा लाख टके का सवाल यह है कि अगर 2019 में पप्पू जनता की पसन्द बन गया तो उन्हें पप्पू बताने वाले योग्य कहाँ जाएंगे?

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